वर्ल्ड कप शुरू होने में कुछ ही हफ्ते बचे हैं। रूस में होने वाले वर्ल्ड कप 2018 के लिए क्वॉलिफाई कर चुके देशों ने कमर कस ली है। हर बार वर्ल्ड कप हमें एक विनर और एक हीरो देकर जाता है। वर्ल्ड कप में कोई ना कोई प्लेयर ऐसा जरूर निकलकर आता है जो अपने प्रदर्शन से लोगों को अपनी दीवाना बना लेता है।


फिर चाहे वो पेले हों, बेकनबेउर हों, मेसी हों या फिर हामेज रोड्रिगेज़। वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले हमने शुरू की है ये सीरीज जिसमें हम आपको हर वर्ल्ड कप के एक हीरो के बारे में बताएंगे।


इस सीरीज के चौथे पार्ट में आज हम बात करेंगे 1950 ब्राज़ील वर्ल्ड कप की जिसके हीरो थे (आप खुद से फैसला करें)।


जैसा कि हमने आपको पिछली कहानी में बताया था कि कैसे ब्राज़ीली मैनेजर के अति-आत्मविश्वास के चलते लियोनाइडस के दमदार खेल के बावजूद 1938 वर्ल्ड कप में ब्राज़ील को तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था। इस वर्ल्ड कप के बाद विश्व युद्ध के चलते दो बार वर्ल्ड कप का आयोजन ही नहीं हो पाया। 1942 और 1946 के वर्ल्ड कप को द्वितीय विश्व युद्ध के चलते रद्द करना पड़ा।


फीफा 1949 में वर्ल्ड कप कराना चाहती थी लेकिन विश्व युद्ध में तबाह हुए यूरोपियन देश इसकी मेजबानी के लिए तैयार ही नहीं हुए। साउथ अमेरिकी देश ब्राज़ील ने फीफा के सामने प्रस्ताव रखा कि वह वर्ल्ड कप होस्ट करना चाहते हैं लेकिन उनकी मांग थी कि यह 1949 में ना होकर 1950 में हो।

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तस्वीरः 1950 वर्ल्ड कप में भाग लेने वाली उरुग्वे की टीम


फीफा ने ब्राज़ील की मांग स्वीकार कर ली और 1946 में तय हुआ कि अगला वर्ल्ड कप 1950 में ब्राज़ील में खेला जाएगा। डिफेंडिंग चैंपियंस के रूप में इटली और होस्ट के रूप में ब्राज़ील का खेलना तो तय ही था बाकी के लिए सात यूरोपियन, 6 साउथ अमेरिकी और एक एशियन टीम को क्वॉलिफायर्स के जरिए शामिल करने का फैसला हुआ। होस्ट मिलने के बाद अब फीफा के सामने समस्या थी टूर्नामेंट में खेलने के लिए टीम्स को मनाना।


17 साल के स्व-निर्वासन के बाद ब्रिटिश देश फीफा में वापसी कर चुके थे और ब्रिटिश होम चैंपियनशिप के आधार पर इंग्लैड और स्कॉटलैंड को वर्ल्ड कप में जगह मिली। सोवियत यूनियन, चेकोस्लोवाकिया और हंगरी ने टूर्नामेंट में भाग लेने से मना कर दिया जबकि क्वॉलिफिकेशन के दौरान अर्जेंटीना, इक्वाडोर, पेरू, फिलीपींस, इंडोनेशिया और बर्मा ने अपना नाम वापस ले लिया।

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फोटोः ब्राज़ीली फॉरवर्ड अदेमिर


ऑस्ट्रिया और बेल्जियम ने भी क्वॉलिफिकेशन के दौरान ही अपने-अपने नाम वापस ले लिए। यह इकलौता वर्ल्ड कप था जिसमें भारत को खेलने का मौका मिला। एशिया के एक स्पॉट के लिए फिलीपींस, इंडोनेशिया और बर्मा के नाम वापस लेने के चलते भारत को वर्ल्ड कप के लिए डायरेक्ट क्वॉलिफिकेशन मिल गया।


हालांकि भारतीय टीम ने आने-जाने के खर्चे और ओलंपिक्स को ज्यादा वरीयता देते हुए ऐन वक्त पर अपना नाम वापस ले लिया। कहा जाता है कि फीफा टीम इंडिया के खर्चे का बड़ा हिस्सा वहन करने को तैयार थी लेकिन AIFF ने इस टूर्नामेंट के लिए अपनी टीम भेजने से साफ मना कर दिया।


खैर वर्ल्ड कप शुरू हुआ और ब्राज़ील ने नया प्रपोजल रख दिया। 1934 और 1938 में हुए नॉकआउट तरीके की जगह ब्राज़ील की मांग थी कि टीम्स को चार ग्रुप्स में बांट दिया जाए और फिर हर ग्रुप के विनर्स आपस में राउंड-रोबिन (एक दूसरे के खिलाफ) खेलें और इसे टॉप करने वाला वर्ल्ड चैंपियन बन जाए।


इसके पीछे पूरी तरह से पैसा जिम्मेदार था क्योंकि इसमें 30 मैच होते, ज्यादा गेट रेवेन्यू मिलता जबकि नॉकआउट में ज्यादा से ज्यादा 16 मैच हो पाते थे। फीफा ने ब्राज़ील की इस मांग को मानने से मना कर दिया लेकिन ब्राज़ील द्वारा मेजबानी से पीछे हटने की धमकी के बाद फीफा को यह मांग माननी पड़ी।

ब्राज़ील ने अपने पहले ग्रुप मैच में मैक्सिको को 4-0 से पीटा जिसमें अदेमिर ने दो गोल्स दागे। इस तरह से फुटबॉल के दीवाने ब्राज़ील को नया हीरो दिखने लगा। अदेमिर के हर टच पर स्टेडियम नारों से गूंज उठता था। दूसरे ग्रुप मैच में अदेमिर गोल नहीं कर पाए और स्विट्जरलैंड ने दो बार पिछड़ने के बाद ब्राज़ील को 2-2 के ड्रॉ पर रोक लिया।


टीम के लास्ट ग्रुप मैच में अदेमिर और ज़िज़िनियो के गोल्स के दम पर ब्राज़ील ने यूगोस्लाविया को 2-0 से हराकर अपना ग्रुप टॉप करते हुए फाइनल राउंड में जगह बनाई। फाइनल राउंड में ब्राज़ील के सामने थे उरुग्वे, स्पेन और स्वीडन। ब्राज़ील ने फाइनल राउंड की जोरदार शुरुआत की। अदेमिर के चार गोल्स की मदद से उन्होंने स्वीडन को 7-1 से धो दिया।

Uruguayan former footballer Alcides Ghig

फाइल फोटोः अल्सीडेस गिजिया


ब्राज़ील की प्रचंड फॉर्म दूसरे मैच में भी जारी रही और बेहतरीन टीम प्रदर्शन जिसमें अदेमिर का भी एक गोल शामिल था, के दम पर उन्होंने स्पेन को 6-1 से पीटा। दूसरी तरफ एक जीत और एक ड्रॉ के साथ उरुग्वे दूसरे नंबर पर थी और उरुग्वे वर्सेज ब्राज़ील के लास्ट ग्रुप मैच जीतने वाली टीम को वर्ल्ड चैंपियन बनना था। पिछली बार मैनेजर की गलती से सेमीफाइनल से ही बाहर हुए ब्राज़ीली इस बार अपने घर में जीत के लिए पूरी तरह से आश्वस्त थे।


16 जुलाई 1950 का वह दिन भी आ गया जब उरुग्वे और ब्राज़ील को फाइनल (लास्ट ग्रुप मैच) में भिड़ना था। ब्राज़ील की फॉर्म को देखते हुए ऐतिहासिक माराकाना स्टेडियम में जुटी जनता जश्न की पूरी तैयारी के साथ आई थी। उस दिन माराकाना में 199, 854 लोग जमा थे। लगभग दो लाख लोगों की यह भीड़ अपनी टीम (ब्राज़ील) को वर्ल्ड चैंपियन बनते देखने के लिए बेकरार थी।

File photo taken 16 July 1950 at the Maracan stadi

तस्वीरः उरुग्वे के लिए बराबरी का गोल दागते शफीनो


स्टेडियम में जोश चरम पर था और ब्राज़ीली प्लेयर्स के हर टच के बाद फैंस के शोर से ऐसा लगता था कि आसमान फट जाएगा। इस इंटेंस हाल में मैच का पहला हाफ 0-0 की बराबरी पर खत्म हुआ। होम फैंस अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे और इसी बीच मैच के 47वें मिनट में फ्रिएका ने गोल कर ब्राज़ील को 1-0 की लीड दिला दी।


जरा सोचिए, वर्ल्ड कप का फाइनल है और आधा टाइम बीतने के बाद आप 1-0 से पीछे हैं और मैदान में बैठे 2 लाख लोग आपको हतोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, ऐसे में कमजोर दिल के लोग तो खेल ही नहीं पाएंगे। लेकिन सबसे पहले वर्ल्ड कप के विनर्स के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।

फैंस और ब्राज़ीली प्लेयर्स के प्रेशर से डील करते हुए मैच के 66वें मिनट में हुआन अल्बर्टो शफीनो ने उरुग्वे के लिए बराबरी का गोल दाग दिया। इसके बाद ब्राज़ील फैंस का शोर और प्लेयर्स का जोश बियर मग के झाग की तरह बैठता गया और उरुग्वे ने मैच पर पकड़ बनानी शुरू कर दी।


राइट विंगर अल्सीडेस गिजिया ने मैच के 79वें मिनट में उरुग्वे के लिए मैच का दूसरा गोल दागकर स्कोर 2-1 कर दिया। फाइनल सीटी बजने तक स्कोर यही रहा और उरुग्वे ने ब्राज़ील को 2-1 से हराकर अपना दूसरा वर्ल्ड कप जीत लिया। इस घटना को ब्राज़ील और वर्ल्ड फुटबॉल में Maracanazo (माराकाना की त्रासदी) के नाम से जाना जाता है। कई बार इसकी तुलना जापान पर गिराए गए एटम बम से भी की जाती है।


इस वर्ल्ड कप का हीरो कौन था.... इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं है। जहां एक तरफ हैं अदेमिर जिन्होंने गोल्स की बारिश कर (कुल 8 गोल्स) ब्राज़ील को फाइनल तक पहुंचाया तो वहीं दूसरी तरफ इटली और उरुग्वे दोनों के लिए खेले शफीनो और गिजिया हैं जिन्होंने 2 लाख लोगों के शोर के बीच पिछड़ी उरुग्वे को जीत दिलाई।


इस वर्ल्ड कप का हीरो चुनने की जिम्मेदारी हम आपको सौंपते हैं, अगर आपने पूरा आर्टिकल पढ़ा तो कमेंट में हमें बताएं कि आपके हिसाब से इस वर्ल्ड कप का हीरो कौन था।

Sao Paulo Prepares For Start Of World Cup

1950 वर्ल्ड कप में इस्तेमाल हुआ एक जूता


वैसे एक बात तो साफ है कि अगर ब्राज़ील यह वर्ल्ड कप जीत जाती तो अदेमिर शायद पेले के बराबर या उनके आसपास खड़े होते लेकिन उनकी एक नाकामी के चलते ब्राज़ील में उनका वो रुतबा नहीं रहा।