ओइनम बेमबेम देवी, भारतीय महिला फुटबॉल का सबसे बड़ा पर गुमनाम नाम। 37 साल की उम्र, 2 दशक से भी लम्बा कैरियर, 85 इंटरनेशनल मैच, 32 इंटरनेशनल गोल, कई इंटरनेशनल टाइटल, विदेशी क्लब के लिए खेलने वाली भारत की पहली महिला फुटबॉलर लेकिन फिर भी किसी पहचान से महरूम।


टीम के साथियों में ‘दीदी’ नाम से मशहूर बेमबेम का बस एक यही दर्द है। वह कहती हैं कि ‘महिला फुटबॉल में अब हालात सुधरे हैं,अब हमें स्पॉन्सरशिप भी मिलने लगी है, खेल कोटे से ठीक ठाक नौकरी भी लग जाती है लेकिन जो नहीं मिल पाता है वो है- हमारे काम को पहचान और नाम।


बेमबेम देवी ना सिर्फ महिला फुटबॉल की कम लोकप्रियता परेशान दिखती हैं बल्कि वह कहती हैं कि हमें निराशा तब मिलती है जब सरकारें भी हमें नजरंदाज करने लगती हैं। उन्होंने 2014 से 2016 तक लगातार तीन बार अर्जुन पुरस्कार के लिए अप्लाई किया था लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी थी।


बेमबेम ने तब कहा था, “हम इस पर ज्यादा कुछ बोल भी नही सकते। अवॉर्ड देना या ना देना चयनकर्ताओं के हाथ में होता है, पर अफसोस बहुत होता है और बहुत बुरा भी लगता है।” बेमबेम कहती हैं कि हमने देश के लिए खेलने के लिए जो व्यक्तिगत त्याग और बलिदान किया उसको मान्यता और पहचान जरूर मिलनी चाहिए।

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हालांकि 2017 बेमबेम देवी के लिए अच्छा गुजरा। उन्होंने पहली इंडियन विमिंन लीग की खिताबी जीत के साथ अपने प्रोफेशनल करियर को अलविदा कहा और इसी साल ही उन्हें अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया। 2017 फीफा अंडर-17 विश्व कप के उद्घाटन के समय जब प्रधानमंत्री मोदी भारत के पूर्व और वर्तमान फुटबॉलरों को सम्मानित कर रहे थे तो बेमबेम देवी वह सम्मान पाने वाली एकमात्र महिला फुटबॉलर थीं।


आई एम विजयन, बाइचुंग भुटिया जैसे फुटबॉलरों के बीच एक विश्व मंच पर सम्मान मिलना निश्चित रूप से पूरे महिला फुटबॉल के लिए सम्मान की बात थी। बेमबेम ने तब कहा था कि यह सिर्फ मेरा सम्मान नहीं बल्कि समूचे महिला फुटबॉल का सम्मान है।


फुटबॉल खेलने के लिए बनना पड़ा था लड़का

1980 में मणिपुर की राजधानी इम्फाल में पैदा हुई बेमबेम को उनके पिता प्रोफेसर बनाना चाहते थे। इसलिए वह लगातार बेमबेम को पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह देते थे, पर बेमबेम का जुनून कुछ और ही था। उन्होंने सिर्फ 8 साल की उम्र में फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया। आसपास लड़कियों की टीम ना होने के कारण वे कॉलोनी के लड़कों के साथ फुटबाल खेलती थीं।


हम सबको पता है कि पूर्वोत्तर में फुटबॉल का अपना ही क्रेज है, लेकिन इस पुरुषवादी समाज की तरह वहां की फुटबॉल बिरादरी में भी पुरुषों यानी लड़कों का ही कब्जा है। बेमबेम के समय यानी 80 के दशक में तो यह खाई और भी बड़ी थी। लड़कियां ना के बराबर ही फुटबॉल खेलती थीं, इसलिए बेमबेम को अपनी पहचान छुपानी पड़ी।


इसके लिए उन्होंने अपना नाम भी बदलकर ‘बोबो’ कर लिया था। बेमबेम के छोटे बाल और उनकी कद काठी भी इसमें सहायक थी। इससे विपक्षी टीम के खिलाड़ियों को बेमबेम के लड़की होने का शक नहीं होता था। बेमबेम बताती हैं वह शुरुआती दौर मेरे लिए काफी कठिन था। हर समय पहचान छिपाना आसान नहीं होता, लेकिन लड़कों के साथ फुटबॉल खेलने से उनको फायदा ही हुआ। इससे उनके खेल के स्तर, क्षमता और तकनीकी क्षेत्र तीनों में सुधार हुआ।

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बेमबेम के फुटबॉल करियर में पहली बाधा उनका परिवार ही था। बेमबेम के पिता को बेमबेम का फुटबॉल खेलना सख्त नापसंद था। एक निम्न मध्यमवर्गीय पिता की तरह वह अपने बेटी को खूब पढ़ाकर उन्हें अकैडमिक क्षेत्र में स्थापित करना चाहते थे। हालांकि बेमबेम को अपने भाइयों से पूरा सहयोग मिला।


बेमबेम जब भी फुटबॉल खेलकर घर वापस आती थी तो चोट के कारण उन्हें हर रोज अपने घर वालों से डांट मिलती थी। चोट कम लगे या लोगों को दिखाई ना दें इसके लिए बेमबेम को कभी-कभी फुल पैंट पहन कर भी खेलना पड़ता था। वह घर में अक्सर फुल पैंट में ही रहती थी ताकि उनकी चोट घरवालों को दिखाई ना दे।


लड़के के रूप में जीता था अपना पहला फुटबॉल टूर्नामेंट

धीरे-धीरे बेमबेम की पहचान पूरे इम्फाल में बनने लगी। उन्हें एक बेहतर फुटबॉलर के रूप में जाना जाने लगा। उन्हें यूनाइटेड पायनियर क्लब नामक एक टीम में जगह भी मिली। इस टीम के साथ मिलकर उन्होंने इम्फाल में एक टूर्नामेंट जीता। बेमबेम बताती हैं कि कई बार दर्शकों को उनके लड़की होने का शक हुआ लेकिन लोगों के पास इसे साबित करने के लिए कुछ नहीं था।


बेमबेम की इस उपलब्धि के बाद उनके घर वाले भी अब उनके साथ हो गए। परिवार, खासकर बेमबेम के पिता ने बेमबेम को अब पूरा समर्थन देना शुरू किया। यह 1991 का शुरूआती दौर था। उस साल महिलाओं की नेशनल चैंपियनशिप इम्फाल में ही हुई थी। इतनी सारी लड़कियों को फुटबॉल खेलता देख इसका फाइनल देखने गईं बेमबेम का आत्मविश्वास जागा और उन्होंने अब तय किया कि वह अब लड़का नहीं लड़की के रूप में ही फुटबॉल खेलेंगी। बेमबेम का कहना था कि इतनी सारी लड़कियों को एक साथ फुटबॉल खेलता देखने के बाद वह अपनी पहचान को ज्यादा देर तक नहीं छिपा सकती थी।


यावा क्लब में मिली जगह

बेमबेम देवी को जल्द ही इम्फाल के ही एक क्लब यावा (YAWA) में जगह मिल गई। इस तरह उन्होंने महिला फुटबॉल की दुनिया में कदम रखना शुरू किया। बेमबेम को अब सफलताएं मिलने लगी थी। 1991 में ही उन्हें मणिपुर की जूनियर टीम में भी जगह मिली और उन्हें सब जूनियर चैंपियनशिप खेलने के लिए रोहतक, हरियाणा जाने का भी मौका मिला।


यह पहली बार हो रहा था जब बेमबेम मणिपुर से बाहर जा रही थी। हालांकि इस टूर्नामेंट में बेमबेम को ज्यादा मौके नहीं मिले। वह अधिकतर बेंच पर ही बैठी रहीं। लेकिन इससे उन्हें लंबे समय तक घर से बाहर रहने और खेलने का अनुभव प्राप्त हुआ जो बाद में उनके लंबे करियर में बहुत काम आया।


सिर्फ 15 साल की उम्र में बनी नेशनल टीम का हिस्सा

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अब बेमबेम को जहां भी मौका मिलता वह अच्छा प्रदर्शन करती। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वह इम्फाल में खेल रही हैं, मणिपुर के किसी और हिस्से में या देश के किसी और कोने में। उन्होंने अपनी प्रैक्टिस और फिटनेस के लिए शेड्यूल तय कर लिया था। वह इसका कड़ाई से पालन करती थीं।


खुद बेमबेम देवी के ही शब्दों में ‘कड़ी मेहनत बेशक थकान लाती है, लेकिन क्या थकान से कभी कोई मरता है!’ बेमबेम को इस कड़ी मेहनत का फायदा भी मिला और वह सिर्फ 15 साल की उम्र में भारतीय टीम में शामिल हो गईं। यह वही समय होता है जब हम हाईस्कूल की परीक्षाएं देते हैं और इस उम्र में बेमबेम और बड़ी परीक्षा देते हुए मलेशिया में गुआम के खिलाफ अपना पहला इंटरनेशनल मैच खेल रही थीं।


भारत इस टूर्नामेंट में कुछ खास नहीं कर पाया लेकिन बेमबेम देवी ने अपनी स्किल्स और टेंपरामेंट से हर किसी को प्रभावित किया। वह एक सेंटर मिडफील्डर थीं लेकिन जब भी उन्हें मौका मिलता था वह एक फॉरवर्ड की तरह गोल करने से नहीं चूकती थीं। यही कारण है उनके नाम 30 से अधिक इंटरनेशनल गोल्स हैं, जो कि एक रिकॉर्ड है। बेमबेम के नाम भारत के लिए सबसे ज्यादा इंटरनेशन गोल्स और सबसे अधिक मैच खेलने का रिकॉर्ड है।


अपनी कप्तानी में किया सबसे अनूठा प्रयोग

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भारतीय टीम में खुद को टीम में स्थापित करने के बाद बेमबेम को दूसरी सबसे बड़ी चुनौती 2003 में मिली, जब उन्हें मलेशिया में होने जा रहे AFC क्वॉलिफाइंग टूर्नामेंट के लिए टीम की कप्तानी मिली। बेमबेम कहती हैं कि उनके लिए यह बहुत ही चुनौतीपूर्ण था। भारतीय टीम में अधिकतर खिलाड़ी पूर्वोत्तर से थीं। जबकि कुछ खिलाड़ी उत्तर भारत और दक्षिण भारत से।


इस कारण टीम को आपसी संवाद में काफी दिक्कतें होती थी। उन्होंने इस संवादहीनता को दूर करने के लिए खिलाड़ियों को एक दूसरे की भाषा सीखने-समझने की सलाह दी। उन्होंने पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के खिलाड़ियों को हिंदी और उत्तर भारतीय खिलाड़ियों को मणिपुरी सीखने को कहा। भारतीय टीम को इसका फायदा भी हुआ। 


भारतीय टीम ने बेमबेम की कप्तानी में 2010, 2012 और 2014 में सैफ कप (साउथ एशियन फुटबॉल फेडरेशन विमिंस कप) का खिताब जीता। इसके अलावा 2010 और 2016 में बेमबेम देवी ने साउथ एशियन गेम्स में भी भारत को टाइटल दिलवाया।


साल की सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर बनने वाली प्रथम महिला

अब उन्हें भारतीय फुटबॉल में पहचान भी मिलनी शुरू हो गई। 2001 में उन्होंने पुरुष फुटबॉलरों को पछाड़ते हुए भारतीय फुटबॉल फेडरेशन के साल के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर का खिताब जीता। वह यह सम्मान पाने वाली पहली महिला फुटबॉलर बनी। उन्हें 2013 में भी यह पुरस्कार मिला।


विदेशों में भी लहराया परचम

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साल 2014 में बेमबेम को मालदीव के न्यू रेडियंट स्पोर्टस क्लब से खेलने का मौका मिला और इस तरह वह किसी भी विदेशी क्लब में खेलने वाली देश की प्रथम महिला बनी। यहां उन्होंने सिर्फ 3 मैच खेलते हुए कुल 6 गोल और 4 असिस्ट किए। उनके इस खेल की बदौलत उनकी टीम ने खिताब जीता और बेमबेम को टूर्नामेंट की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का खिताब मिला।


हर जगह जीत के साथ ही कहा अलविदा

इंटरनेशनल फुटबॉल हो या क्लब फुटबॉल बेमबेम देवी ने हर जगह जीत के साथ ही खेल को विदा कहा। उन्होंने 31 दिसम्बर 2015 को अपने 20 साल के लंबे करियर से संन्यास की घोषणा कर दी। लेकिन ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन ने उन्हें 2016 के साउथ एशियन गेम्स में खेलने के लिए मनाया।


बेमबेम कहती हैं कि यह उनके लिए अभीभूत कर देने वाला क्षण था, जब फेडरेशन के किसी अधिकारी ने उन्हें फोन कर फिर से खेलने की बात कही। बेमबेम कहती हैं कि महिला फुटबॉल में पैसा वैसे ही नहीं है इसलिए जब थोड़ा सा सम्मान भी मिलता है तो भी अच्छा लगता है। भारतीय टीम ने इस टूर्नामेंट में जीत दर्ज करते हुए बेमबेम को शानदार विदाई दी।


बेमबेमअपने घर यानि कि इम्फाल में भारतीय महिलाओं ने फाइनल में नेपाल को 4-0 से हराकर साउथ एशियन गेम्स का खिताब जीता। बेमबेम के लिए अपने घरेलू दर्शकों के सामने मैदान छोड़ना एक भावुक कर देने वाला पल था। उन्होंने बताया कि एक बार वह रो उठी जब टीम की एक साथी खिलाड़ी ने कहा ‘दीदी, आप छोड़ देगा...तो हम कैसे खेलेगा।’

साथी खिलाड़ियों में ‘दीदी’ के नाम से मशहूर बेमबेम सबसे अनुभवी खिलाड़ी होने के बावजूद अपनी विनम्रता के लिए जानी जाती थीं। वह खिलाड़ियों से अपना अनुभव बांटने से कोई गुरेज नहीं करती थी, इसलिए प्लेयर्स उन्हें प्यार से दीदी भी कहते हैं।


बेमबेम ने मैदान पर एक बार फिर से वापसी की जब AIFF ने पहली बार इंडियन विमिंन लीग (IWL) शुरू किया। जनवरी-फरवरी, 2017 में हुए इस टूर्नामेंट में बेमबेम मणिपुर की ईस्टर्न स्पोर्टिंग यूनियन क्लब की तरफ से खेलीं। वह इस क्लब की ना सिर्फ खिलाड़ी थी बल्कि वह टीम की कोच भी थीं। उनकी अगुवाई में ईस्टर्न स्पोर्टिंग यूनियन ने खिताब जीता और इस तरह बेमबेम देवी ने जीत के साथ ही क्लब फुटबॉल से संन्यास लिया।

जब इस दिन मैंने बेमबेम से बात की थी तो वह अपने करियर से पूरी तरह संतुष्ट नजर आ रहीं थी। हां उन्हें एक बात की निराशा थी कि उन्हें अब तक (तब तक) अर्जुन पुरस्कार नहीं मिला था जबकि वह इसके लिए लगातार चार बार अर्जी डाल चुकी थीं।


हालांकि बेमबेम की यह इच्छा भी जल्द ही पूरी हुई और इसी साल (2017 में) में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया। 37 साल की उम्र में भी पूरी एनर्जी के साथ खेलने के सवाल पर बेमबेम ने कहा था कि ‘मैंने अपना पूरा जीवन ही फुटबॉल को दे दिया है, तो फिर उम्र की चिंता क्यों करनी।’